लीला दर्शन
श्री रामहर्षण दास जी महाराज का परिचय


श्री राम हर्षण दास जी महाराज
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
श्री स्वामी राम हर्षण दास जी महाराज का जन्म 25 मई 1917 को विंध्यक्षेत्र रीवाराज्य वर्तमान मध्य प्रदेश के मैहर जिले के पोंड़ी कला ग्राम में हुआ था। जन्म के समय उनके मस्तक पर स्पष्ट तिलक चिह्न थे, जिसके कारण उनका नाम 'तिलकधारी' रखा गया। उनके पिता पंडित रामजीवन शरण त्रिपाठी धर्मशास्त्रों के ज्ञाता एक आदर्श सरयूपारीण ब्राह्मण थे । उनके पिता का नाम पंडित रामजीवन शरण त्रिपाठी और माता का नाम रानी जी था।
माता रानी जी भी धार्मिक प्रवृत्ति की थीं और वे विशेष रूप से श्रीराम और देवी सीता की परम भक्त थीं। स्वामी जी का परिवार संस्कारों और आध्यात्मिक चेतना से ओत-प्रोत था, जिससे उनका जीवन प्रारंभ से ही भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर हुआ।
स्वामी जी की माता श्री किशोरी जी को अपनी बेटी के रूप में मानती थीं, और 1933 से उनके साथ धूमधाम से श्री सीताराम विवाहोत्सव मनाने लगीं, तभी से श्री सीताराम विवाहोत्सव मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। आज भी उनकी जन्मभूमि पोंड़ी धाम में द्वितीय से सप्तमी तक श्री सीताराम विवाहोत्सव समैया का आयोजन होता है, जिसमें देश के कोने-कोने से भक्तजन शामिल होते हैं। जन्मभूमि पोंड़ी धाम श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण पवित्र स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।
आपकी जन्मभूमि पोंड़ी धाम में दो मन्दिर हैं। एक उनकी माता जी का जिनकी गोद में श्री सीताराम जी प्रतिष्ठित हैं। दूसरा आचार्यपीठ नाम से प्रसिद्ध स्वामी जी का दर्शनीय विशाल मंदिर है। ऐसा दिव्य मन्दिर शीध्र देखने को नहीं मिलता । यहाँ देशभर से संत-महात्मा आकर भक्ति मार्ग के उपदेश लेते हैं। जन्मभूमि पोंड़ी धाम में निरंतर . श्री सीताराम नाम संकीर्तन होता है । यहाँ श्री सीताराम विवाहोत्सव समैया के अतिरिक्त श्री रामनवमी ,जानकी नवमी, रथ यात्रा , झूलन, जन्माष्टमी आदि उत्सव मनाए जाते हैं। साथ ही ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी से ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी तक सरकार की जयंती का महा महोत्सव बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है । जिससे यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है।
स्वामी जी बाल्यकाल से ही वे भगवान श्रीराम के प्रति विशेष अनुराग रखते थे। वे साधारण खेलों की बजाय धार्मिक अनुष्ठानों और सत्संगों में रुचि लेते थे। माता जी के संरक्षण में उन्हें वेद, पुराण, रामायण और भगवद्गीता का अध्ययन करने का अवसर मिला, जिससे उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासा और बढ़ी। और गृहस्थ जीवन में ही उन्होंने श्रीमद्भागवत, वाल्मीकि रामायण आदि की कथाओं के माध्यम से जनकल्याण किया वहीं उनके अनेक शिष्य बन गए थे।
श्री राम हर्षण दास जी ने युवावस्था में ही वैराग्य के संकेत देने शुरू कर दिए थे, लेकिन माता जी के आग्रह पर उन्होंने गृहस्थ आश्रम स्वीकार किया। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी वे संतों और भक्तों के साथ निरंतर जुड़े रहे। श्रीराम मंत्र जाप एवं गहन साधना में लीन रहे।
श्री राम हर्षण दास जी महाराज का जीवन एक प्रेरणा है, जिसमें भक्ति, ज्ञान और त्याग का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। उनके द्वारा स्थापित आदर्श आज भी लोगों को धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। आप अयोध्या के एक महान संत और वैष्णव परंपरा के प्रमुख आचार्य थे। उन्हें प्रेमावतार, पंचरसाचार्य और करुणा वरुणालय जैसे विशेषणों से सम्मानित किया जाता था।
उनके द्वारा स्थापित पोंड़ी धाम , खजुहा, रीवा , सीधी , विजयराघवगढ़, शाहनगर , छतरपुर, अयोध्या के मन्दिर भक्तों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं।
श्री स्वामी राम हर्षण दास जी महाराज की तपस्थली मिथिला बिहारी कुंज, जिसे खजुहा धाम के नाम से भी जाना जाता है, मध्य प्रदेश के रीवा जिले में स्थित एक पवित्र स्थल है। यह स्थान स्वामी जी की गहन साधना और भक्ति का केंद्र रहा है, जहाँ उन्होंने अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय व्यतीत किया।
मिथिला बिहारी कुंज आश्रम स्वामी जी की तपस्या का प्रमुख स्थल है, जहाँ भक्तजन आध्यात्मिक शांति और प्रेरणा के लिए आते हैं। यहाँ नियमित रूप से सत्संग, कीर्तन और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जो भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करने में सहायक होते हैं। आश्रम में स्वामी जी के उपदेशों और शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया जाता है, जिससे लोग धर्म, भक्ति और मानवता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
खजुहा धाम महाराज जी की तपस्या और भक्ति का साक्षी है, जहाँ आज भी उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा महसूस की जा सकती है। यह स्थान भक्तों के लिए एक प्रेरणास्त्रोत है, जो उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है। खजुहा धाम में भी फाल्गुन शुक्ल द्वितीय से सप्तमी तक श्री सीताराम विवाहोत्सव समैया का आयोजन होता है
खजुहा धाम मे ही स्वामी जी ने १३ करोड़ श्री राम मंत्र का जाप किया था I जिसका दशमांश हवन श्री राम मंत्र महायज्ञ के रूप में सन् १९९७ में श्री राम हर्षण कुंज, अयोध्या धाम में संपन्न हुआ। उनकी उत्कृष्ट साधना के कारण कई बार भक्तों ने उनके शरीर पर श्री राम नाम अंकित देखा है।
स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज भारतीय संत परंपरा के महान संतों में से एक थे। उन्होंने अपने जीवन को पूर्ण रूप से भगवद्भक्ति, साधना, और सेवा में समर्पित किया। उनका जन्म एक धार्मिक और भक्तिमय वातावरण में हुआ, जिससे वे प्रारंभ से ही आध्यात्मिक साधना की ओर आकर्षित हुए। उनका मन सांसारिक बंधनों से हटकर ईश्वर की भक्ति में स्थिर हो गया, और उन्होंने विरक्ति का मार्ग अपनाने का संकल्प लिया।
उनकी इस आध्यात्मिक यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने अयोध्या स्थित पूज्य गुरुदेव श्री अखिलेश्वर दास जी महाराज के श्रीचरणों में आत्मसमर्पण किया।
स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज के पूज्य गुरुदेव श्री अखिलेश्वर दास जी महाराज -
श्री अखिलेश्वर दास जी महाराज अयोध्या के परम पूजनीय संतों में से एक थे। वे अयोध्या के श्री राम कुंज, रामघाट में विराजमान थे, जो साधना, भक्ति और सत्संग का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। वे भारतीय संत परंपरा के उन महान संतों में थे, जिन्होंने अनेक शिष्यों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान किया। श्री अखिलेश्वर दास जी महाराज का व्यक्तित्व अत्यंत दिव्य और प्रभावशाली था। वे वेदों, उपनिषदों, गीता, रामायण और भक्त साहित्य के मर्मज्ञ थे। उनके उपदेशों में भक्ति, वैराग्य, और सेवा का अद्भुत संगम देखने को मिलता था। उन्होंने संपूर्ण जीवन वैष्णव धर्म की सेवा और भगवान श्रीराम की भक्ति में समर्पित किया। उनके अनेक शिष्य हुए, जिन्होंने उनके दिखाए मार्ग पर चलकर समाज में भक्ति और सेवा का प्रसार किया।
स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज ने सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त करने और संन्यास ग्रहण करने का निश्चय किया। अपने आध्यात्मिक जीवन को और अधिक परिपक्व करने तथा संपूर्ण रूप से भक्ति मार्ग में प्रवृत्त होने के लिए उन्होंने पूज्य श्री अखिलेश्वर दास जी महाराज से दीक्षा लेने का संकल्प लिया। 1954 की अक्षय नवमी के शुभ दिन, श्री राम कुंज, रामघाट, अयोध्या में, स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज ने पूज्य श्री अखिलेश्वर दास जी महाराज से संन्यास (विरक्ति दीक्षा) ग्रहण की। इस दिव्य अवसर पर अयोध्या के कई संत-महात्माओं और भक्तजनों की उपस्थिति रही। इस दीक्षा के साथ, उन्होंने संपूर्ण जीवन भगवान श्रीराम की भक्ति, प्रवचन, सत्संग और सेवा के लिए समर्पित कर दिया तथा जीवनभर अपने गुरुदेव की शिक्षाओं का पालन किया।
श्री राम कुंज, रामघाट, अयोध्या पूज्य श्री अखिलेश्वर दास जी महाराज का पावन आश्रम था। श्री राम कुंज का वातावरण भक्तिमय और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर था। यहाँ भगवान श्रीराम के नाम-स्मरण, भागवत कथा, रामायण पाठ, और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता रहता था। यह स्थान उन श्रद्धालुओं और साधकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण था जो भक्ति और साधना के मार्ग पर अग्रसर होना चाहते थे।यह स्थान साधकों और संतों के लिए एक प्रमुख केंद्र था, जहाँ नियमित रूप से सत्संग, प्रवचन और साधना का आयोजन होता था।
गुरु-शिष्य परंपरा एवं आध्यात्मिक योगदान
स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज ने अपने गुरुदेव के प्रति अटूट श्रद्धा रखी और उनकी शिक्षाओं को आत्मसात कर अपने जीवन का ध्येय बना लिया। वे सदैव अपने प्रवचनों में अपने गुरु की महिमा का गुणगान करते थे और उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते थे। आध्यात्मिक यात्रा में श्री अखिलेश्वर दास जी महाराज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जिसे जीवनभर अपने प्रवचनों, लेखन और सत्संगों के माध्यम से समाज तक पहुँचाया। उन्होंने संत साहित्य, भक्ति साहित्य, और श्रीराम कथा पर अनेक ग्रंथों की रचना की, जो आज भी भक्तों के लिए मार्गदर्शक हैं। स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का गहन अध्ययन किया और पूरे जीवनभर उसी मार्ग पर चलते रहे। उनकी यह गुरु-शिष्य परंपरा आज भी संत समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है।
आज भी लोग स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज की गुरुभक्ति और आध्यात्मिक योगदान को नमन करते हुए, हम इस दिव्य गुरु-शिष्य परंपरा से प्रेरणा लेते हुए भक्ति एवं सेवा का मार्ग अपनाने का संकल्प लेते हैं।
श्री स्वामी राम हर्षण दास जी महाराज के पावन ग्रंथ - 1:- श्री प्रेम रामायण 2:– औपनिषद ब्रह्मबोध 3:– वेदान्त दर्शन (ब्रह्मसूत्र व्याख्या) 4:– गीता ज्ञान 5:– रस चंद्रिका 6:– प्रपत्ति प्रभा स्तोत्र 7:– विशुद्ध ब्रह्मबोध 8:– ध्यान वल्लरी 9:– सिद्धि स्वरूप वैभव 10:– सिद्धि सदन की अष्टयामी सेवा 11:–लीला सुधा सिन्धु 12:– चिदाकाश की चिन्मयी लीला 13:– वैष्णवीय विज्ञान 14:– विरह वल्लरी 15:– प्रेम वल्लरी 16:– विनय वल्लरी 17:– वैदेही दर्शन 18:– मिथिला माधुरी 19:– हर्षण सतसई. 20:– उपदेशामृत. 21:– आत्म विश्लेषण 22:– राम राज्य 23:– सीताराम विवहाष्टक 24:– प्रपत्ति दर्शन. 25:- सीता जन्म प्रकाश 26:– लीला विलाश 27:– प्रेम प्रभा 28:– श्रीलक्ष्मीनिधि निकुंज की अष्टयामीय सेवा 29:– आत्म रामायण 30:– मातृ स्मृति 31:– रस विज्ञान 32:- रहस्य त्रय भाष्यम् (अप्रकाशित 33:– पंच शतक (श्रीसीता शतक , श्रीराम शतक ,श्रीहनुमान शतक ,श्रीसद्गुरु शतक श्री सन्त शतक )
इनके अतिरिक्त विभीषण शरणागति , एकान्तिक लीला , प्रेम समाधि जैसे ग्रन्थ खोगए l
इन ग्रंथों में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के गूढ़ रहस्यों को सरलता से समझाया गया है, जो साधकों के लिए अत्यंत लाभकारी हैं।
श्री रामानन्दीय वैष्णव सम्प्रदाय
स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज का श्री रामानन्दीय वैष्णव सम्प्रदाय भारतीय धार्मिक और भक्ति परंपरा का एक महत्वपूर्ण भाग है। यह सम्प्रदाय भक्ति योग पर आधारित है और भगवान श्री सीताराम जी की उपासना करता है। यह सम्प्रदाय समाज में समानता, प्रेम, और सेवा के सिद्धांतों पर आधारित है।
स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज के सिद्धांत और उपदेश -
स्वामी जी महाराज के मुख्य सिद्धांत निम्नलिखित हैं -
1 भगवद्भक्ति - सम्प्रदाय का मुख्य उद्देश्य भगवान की भक्ति करना है। श्री सीताराम जी की भक्ति को सर्वोपरि माना और उनके नाम का जप, कीर्तन और सेवा को प्रमुख उपासना विधि के रूप में अपनाया।
2 सर्वजन समता - स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज सभी मानव जाति को समान माना जाता है। सभी जाति, वर्ण, वर्ग, लिंग के लोगों को भक्ति मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।
3. गुरु भक्ति – आपकी परम्परा में गुरु को भगवान के रूप में माना जाता है उनका सम्मान और उनकी भक्ति को महत्वपूर्ण माना जाता और उनके उपदेशों का पालन करना मुख्य धर्म ।
4 प्रेम और सेवा - आपकी परम्परा में प्रेम और सेवा को महत्वपूर्ण माना जाता है। सभी भक्त भगवान के प्रति प्रेम और समाज की सेवा करते हुए अपने जीवन को उत्तम बनाने का प्रयास करते हैं।
5 प्रमुख संत और अनुयायी - आपकी परम्परा के अंतर्गत कई महान संत और अनुयायी हुए हैं, जिन्होंने समाज में भक्ति और सेवा का संदेश फैलाया ।
6 समाज पर प्रभाव -
स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज की परम्परा ने भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव डाला। इस परम्परा ने समाज में एकता, भाईचारे और प्रेम का संदेश फैलाया और भक्ति योग के महत्व को प्रतिपादित किया। सम्प्रदाय के अनुयायियों ने जाति, वर्ग और लिंग के भेदभाव को नकारते हुए समाज में समानता की भावना को बढ़ावा दिया।
आपकी परम्परा श्री रामानन्दीय वैष्णव सम्प्रदाय भारतीय धार्मिक और भक्ति परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है। इस सम्प्रदाय ने भक्ति आंदोलन को एक नया दिशा और ऊर्जा दी और समाज में समानता, प्रेम और सेवा का संदेश फैलाया। रामानंद जी के सिद्धांत और उपदेश आज भी प्रासंगिक हैं और हमें जीवन के उच्चतम मूल्यों का पालन करने की प्रेरणा देते हैं।
7 स्वामी श्री राम हर्षण दास जी महाराज की परम्परा के लोग संत धर्म और आध्यात्मिकता का प्रसार करते हैं। वे लोगों को भगवान के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं और उन्हें जीवन के उच्चतम मूल्यों को अपनाने का मार्गदर्शन करते हैं। संत समाज की सेवा और परोपकार में संलग्न होते हैं। वे जरूरतमंदों की मदद करते हैं, गरीबों और असहायों की सेवा करते हैं, और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश करते हैं।
8 शांति और सद्भाव - महाराज जी की परम्परा के लोग संत समाज में शांति और सद्भाव को बढ़ावा देते हैं। वे लोगों को आपसी प्रेम, भाईचारे, और सहिष्णुता की महत्ता सिखाते हैं और समाज में हिंसा और विवादों को समाप्त करने का प्रयास करते हैं। अपने स्वयं के आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयासरत होते हैं। वे अपनी आत्मा को शुद्ध करने और भगवान से एकत्व प्राप्त करने के लिए साधना और तपस्या करते हैं। वे वेदों, पुराणों, उपनिषदों, और अन्य धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से लोगों को शिक्षित करते हैं और उन्हें जीवन के सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
9 महाराज जी के विशिष्टा द्वैत सिद्धांत के अनुसार श्री सीताराम जी की उपासना -
महाराज जी की परम्परा विशिष्टा द्वैत में भक्ति और समर्पण को मुख्य महत्व दिया जाता है। उपासक अपने जीवन को संपूर्णता से भगवान श्री सीताराम जी को समर्पित करता है और उन्हें अपने जीवन का उद्देश्य मानता है।सगुण रूप श्री सीताराम जी के दिव्य रूप का ध्यान , श्री चरणों में श्रद्धा और प्रेम के साथ प्रणाम करते हुए नियमित रूप से प्रार्थना और स्तुति करता है, जिससे भगवान का अनुग्रह प्राप्त हो। भक्त भगवान की मूर्ति या चित्र की सेवा, अर्चना, और भजन-कीर्तन के माध्यम से भक्त भगवान के निकटता का अनुभव करता है। जिसमें विशेष पूजा विधियों, मंत्रों, और आचार संहिता का पालन होता है।
डॉ० भारत प्रसाद मिश्र
(मिथिला विहारी दास)
व्याकरणाचार्य,आयुर्वेद रत्न,एम०ए (हिन्दी) ,
बी०एड,विद्यावारिधि (पी-एच०डी)
